बस्तर 2: ‘सशक्त’ आदिवासी औरतों से मुलाकात!

ये इस यात्रा का दूसरा भाग है, पहला हिस्सा यहां पढ़ें

असली सफर अगली रोज सुबह चालू हुआ. पहला पड़ाव बना ओरछा ब्लॉक. आगे का ब्यौरा बताने से पहले थोड़ी जानकारी दे देती हूं. 11 मई 2007 को नारायणपुर को बस्तर जिले से अलग कर एक नया जिला बनाया गया था. 6640 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस जिले की आबादी 140206 है, जिसमें से 70 प्रतिशत आबादी जनजाति समूह से है. इस जिले में माड़िया, गोंड, मूरिया, हल्बा जनजातियों के लोग सबसे ज्यादा हैं. दो विकासखण्डों नारायणपुर और ओरछा में बंटे इस जिले में 413 गांव हैं.

तो मैं ओरछा ब्लॉक के सफर पर थी. अबूझमाड़ के तिलिस्मी जंगल हमें चारों ओर से घेरे थे. मुख्य सड़क से होते हुए गांव के रास्ते पर गाड़ी आगे बढ़ रही थी. इमारतों की जगह अब दूर तक फैले धान के समृद्ध खेतों ने ले ली. एकदम गाढ़े हरे रंग के पेड़ों से ढंकी पहाड़ियां में अलग सा सम्मोहन था. मद्धिम सी बारिश शुरू हो चुकी थी. दिल्ली की गंधेली हवा में जीते आए हमारे फेफड़े अचानक से मिले इस खुले वातावरण में खुशी से उछलने लगे.

गाड़ी के सापेक्ष हमारे साथ चल रही पहाड़ियों के दूसरे छोर पर सब कुछ बड़ा स्याह सा है, ऐसा बताकर हमारे ड्राइवर ने इस सपनीली तंद्रा से झकझोर जगा दिया. अब तक हम चारों तरफ से आदिवासी गांवों से घिरे इलाकों में पहुंच चुके थे. रास्ते में पड़े सीआरपीएफ के कैम्प पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी हमने.

लाल रंग का साम्राज्य

मैंने चारों ओर नजर घुमाकर देखा. मिट्टी के टीलों की भरमार थी. लाल मिट्टी के टीले. मैं मन ही मन स्वरचित इस सद्यजात फ्रेज पर मोहित हो गई। डामर वाली सड़कों की जगह अब कच्ची मिट्टी के रास्तों ने ले ली थी. बारिश ने सड़क पर काफी चहटा मचा दिया था. अचानक से गाड़ी रुक गई. सामने एक नाले के ऊपर छोटा सा पुल बन रहा था. निर्माण सामग्री वहीं धरी हुई थी. लेकिन पुल को पूरा करने के लिए कारीगर नहीं थे वहां. पूछने पर एक स्थानीय से बताया, ‘दादा लोग’ नहीं बनने देगा ये पुल. दादा लोग कौन? मेरे इस सवाल का जवाब उनकी चुप्पी वाली मुस्कान में था. यहां नक्सलियों को स्थानीय लोग दादा बुलाते हैं.

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आगे का सफर अब पैदल ही तय करना था. हमने उस स्थानीय को अपने साथ ले लिया. अंदर गांव में कुछ ही लोग हिंदी समझते थे. स्थानीय अब हमारा प्यारा सा दुभाषिया बन गया. पैदल चलते-चलते हम इस ओरछा ब्लॉक के मोरहापदर गांव में पहुंच गए. ये इलाका तिलिस्मी के विशेषण से नवाजे गए अबूझमाड़ के जंगलों के काफी पास है. इसीलिए यहां पर अबूझमाड़िया जनजाति के लोग ज्यादा हैं. उनकी भाषा भी अबूझमाड़िया है. बस्तर डिवीजन के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग जनजातियां प्रमुखता से रहती हैं और उन सब की भाषाएं भी एक-दूसरे से काफी अलग होती हैं. मतलब एक ही इलाके में रहते हुए बस्तर का पूरा आदिवासी समाज एक भाषा में एक-दूसरे की बात नहीं समझ सकता. इस एक तथ्य ने मुझे इस इलाके की दुरूहता का एहसास कराना शुरू कर दिया.

वास्तविकता से पहला परिचय

मोरहापदर में पचास से साठ घर थे. उनका मुख्य काम खेती ही था. मैं वहां की औरतों से मिली. अच्छी बात ये हुई कि भले ही वो हिंदी में जवाब नहीं दे पा रही थीं लेकिन मेरी हिंदी समझ ले रही थीं. उनकी बात समझाने के लिए हमारा वो स्थानीय दोस्त तो साथ ही था. वो औरतें खाना पकाती थीं, पालतू जानवरों की देखभाल करती थीं, खेत पर भी जाती थीं लेकिन उनमें वैसे ही सकुचाहट दिखी, औरत होने का बोझ दिखा, जो बाकी के इलाकों की ग्रामीण औरतों में दिखता है. मैंने उनसे माहवारी के बारे में पूछा, उनकी शिक्षा के बारे में पूछा, खान-पान के बारे में पूछा, जचकी के बारे में भी पूछा.

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माहवारी के दौरान वो भी गंदे कपड़े लगाने को मजबूर थीं, शिक्षा ज्यादातर की पांचवीं से ज्यादा नहीं थी, उनमें से कोई भी किसी भी प्रकार से स्किल्ड नहीं थीं. छतीसगढ़ में धान की उपज सर्वाधिक होती है. इसीलिए यहां के भोजन में मुख्य एलीमेंट भात होता है. लेकिन दिक्कत ये है कि आदिवासी समाज इस भात के साथ इमली से बना एक झोल खाता है. उनके खाने में सब्जियां और दाल बहुत ही कम शामिल होती हैं. मेरी मुलाकात गांव की मितानिन से होती है. मितानिन यहां पर आशा बहुओं को बोला जाता है. मितानिन ने बताया कि गांव की ज्यादातर औरतें एनीमिक हैं. लगातार इतना खट्टा खाने से भी उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ता है.

कुकुरमुत्तों को ऐसे सुखाकर स्टोर कर लेते हैं ये लोग, ताकि आगे काम आए.

यहां से आगे सोनपुर गांव था. मोहरापदर के गांव वालों ने चेताया कि शाम होने से पहले वहां से वापस आ जाइएगा. ‘वो लोग’ को अच्छा नहीं लगेगा, अगर कोई बाहरी देर तक उनके इलाके में रुक जाए. मैंने फीकी से मुस्कान दी और बढ़ गई आगे. सड़क पतली होते हुए पगडंडी बने जा रही थी. पहाड़ी के उस पार सोनपुर गांव था. पैदल का रास्ता तकरीबन तीन-चार घन्टे ले लेता.

आतंक का भ्रमजाल

सोनपुर से होते हुए एक बाइक सवार हमारी तरफ चला आ रहा था. हमने उनकी गाड़ी रुकवाई और सोनपुर जाने का रास्ता पूछा. उन्होंने बताया, बारिश की वजह से रास्ता एकदम छतिग्रस्त हो गया है. आपको अगर अंदर जाना ही है तो कृपया अगले दिन जल्दी आएं. हमारे स्थानीय साथी ने भी बोला कि समझदारी इसी में है कि आप वक्त निकालकर कल आएं. मैं आगे जाना चाहती थी. लेकिन अपना ही बनाया एक कोट याद आ गया कि बहादुरी और बेवकूफी में जरा सा ही फर्क होता है. मैंने स्थानीय लोगों की चेतावनी का सम्मान किया और वापस लौट चली.

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लौटते वक्त हमें वहां का साप्ताहिक बाजार दिखा. ये बाजार अंदर सुदूर के गांवों के, जहां सड़क भी नहीं पहुंच पाई है, लोगों के बाहर मुख्यधारा में आने का एक साधन होते हैं. इस बाजार में ज्यादातर औरतें ही अपने सामानों की दूकान लगाकर बैठी थीं. कुछ लोग बैठकर गांव में ही बनी शराब का सेवन कर रहे थे, जिसमें महिलाओं की भी एक टोली शामिल थी. अब ये लाइन पढ़कर खुश होने की कोई जरूरत नहीं है, शराब पीना सशक्तिकरण के बिल्कुल भी समानुपाती नहीं है.

मेरे पहले दिन के अनुभव के मुताबिक, आदिवासी समाज में ऐसा कुछ भी नहीं मिला जो इस कथन की पुष्टि कर सके कि यहां महिलाओं को बराबरी का अधिकार है. गांव में मिले एक शख्स ने हमें बताया था कि यहां औरतें घर का काम भी करती हैं और बाहर भी संभालती हैं. आदमी लोग खाली ताड़ी पीकर टुन्न रहता है.

खैर मैं एक ही दिन में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना नहीं चाहती थी. अब बस अगली सुबह का इन्तजार था.

(आगे की यात्रा का विवरण यहां पढ़ें)


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