दूसरी सदी की एक तकनीक कैसे पैदा कर रही है लाखों रुपए?

सदियों पुराना एक विज्ञान आज इक्कीसवीं सदी में हजारों लोगों के जीवनयापन का स्रोत बन चुका है। एक ऐसी टेक्नीक जो देश के पहाड़ी इलाकों से निकलकर दूरदराज के राज्यों तक फैल गई है। ‘घराट परियोजना’, जिस टेक्नीक को उत्तराखंड के लोगों ने फालतू समझ कर त्याग दिया था, घराटों का इस्तेमाल करना बंद कर दिया था, आज वही घराट ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में बसे परिवारों के लिए खुशहाली की वजह हैं। घराट को मुख्यधारा में लाने का श्रेय जाता है हेस्को को। हेस्को यानि कि हिमालयन एनवायरमेंटल स्टडीज एंड कंजरवेशन ऑर्जेनाइजेशन। ये उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से संचालित होता है।


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यकीन मानिए, ये कहानी जानकर आपका दिल खुश हो जाएगा. हमने निजामुद्दीन दरगाह जाकर जो महसूस किया, उसने हमारे भीतर बचा-खुचा स्याहपन मिटा दिया है. अभी वीडियो देखिए, अगले साल आप भी पहुंचिएगा इसी जगह पर.


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चांदनी चौक में मिलने वाली बर्फी, जिससे तोड़ने के लिए पलंग का इस्तेमाल हुआ

पलंगतोड़ बर्फी सिर्फ दूध, खोया और चीनी से बनी मिठाई है। चांदनी चौक में गुरूद्वारे के पास है मोटे लाला की दुकान। यहीं मिलती है फेमस पलंगतोड़ बर्फी। खाने में बहुत स्वादिष्ट होती है। पहली बार इसे तोड़ने के लिए पलंग का सहारा लेना पड़ा था, जिससे इसका नाम पलंगतोड़ मिठाई पड़ा।


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