रोमांच और सुकून दोनों चाहते हैं तो औली आइए

मैं और मेरी दोस्त द्रोणगिरी की तलाश में अब तक 11 घंटों का सफर तय कर चुके थे। देहरादून से चमोली और चमोली से जोशीमठ। जोशीमठ आते ही हमें हवा में बदलाव का एहसास हुआ। यहां हवा में ठंडक थोड़ी ज्यादा बढ़ चुकी थी। जोशीमठ चारों ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ है। पहाड़ों को चूमते वाइट-ग्रे रंग के बादल नजारों में चार चांद लगा रहे थे। पहाड़ तो मैने पहले भी देखे थे पर यहां के पहाड़ों की बात ही कुछ और थी। वहीं द्रोणगिरी के प्रधान से बात कर के पता चला कि वहां के लोग सर्दियों के समय मलानी माइग्रेट कर जाते हैं। हमें बहुत निराशा हुई। लगा, जैसे हमारी सारी मेहनत पर पानी फिर गया। पर हम रुकने वाले कहां थे। आस-पास के लोगों से बातचीत कर के पता चला कि जोशीमठ से 16 कि.मी. की दूरी पर है औली।

औली के बारे में मैने सुना तो बहुत था। इसे उत्तराखण्ड का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है। औली समुद्र तल से 10 हज़ार फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर बसा है। यह चारों दिशा से पहाड़ों से ढका है। इन पहाड़ों की ऊंचाई 20 हजार फीट से ज्यादा है। यहां सेब और देवदार के ढेर सारे पेड़ हैं जिसके कारण यहां की हवा में ताजगी बनी रहती है। अगर आप महंगे होटलों के शौकीन नहीं हैं तो जोशीमठ में आराम करने के लिए मात्र 300-500 रुपए में आपको अच्छा खासा कमरा मिल जाता है। आप यहां आराम कर के अगले दिन औली के लिए रवाना हो सकते हैं।

ट्रॉली

जोशीमठ से औली तक ट्रॉली का सफर

औली जाने के दो रास्ते हैं या तो आप टैक्सी लेकर बाय रोड जाएं या रोप-वे के जरिए। हमने रोप-वे चुना। 11 घंटों के सफर के बाद मुझमें इतनी ताकत नहीं थी कि बाय रोड जाऊं। 750 रुपए की टिकट में हम दो लोग औली के लिए रवाना हुए। टिकट काउंटर में पता चला कि यह गुलमर्ग के बाद एशिया सबसे लंबा रोपवे है।  रोप-वे से यह मेरी पहली यात्रा थी तो मैं थोड़ा उत्साहित थी। रोपवे पर जैसे ही मेरे सफर का आरम्भ हुआ, मेरी उत्सुकता आसमान छूने लगी। ट्रॉली का धीरे-धीरे आगे बढ़ना और हमारा हवा में होने का एहसास, थोड़ा डर भी पैदा कर रहा था। जैसे-जैसे हम ऊपर जा रहे थे, मेरा डर धीरे-धीरे खुशी में तब्दील हो रहा था। जहां तक हमारी नजर जाती थी वहां तक पहाड़ ही पहाड़ दिख रहे थे। ऊंचे-ऊंचे आकाश चुम्बी पहाड़। हमारे नीचे हल्के और गहरे हरे रंग के घने जंगल और सेबों के खेत थे। हमारे ट्रॉली चालक ने हमे यह बताया कि इन जंगलों में तेंदुए, भालू जैसे जंगली जानवर भी रहते हैं।

औली के मैदान

वो ऊंचे पहाड़, वो खुला आसमान

हमारी उत्सुकता देख कर ट्रॉली चालक हमें एक-एक पहाड़ के बारे में बताने लगा। ट्रॉली चालक ने हमें बताया की सामने जो दिख रहा है वो हाथी पहाड़ है, क्योंकी उसकी आकृति कुछ-कुछ हाथी के सर की तरह थी। उसी से थोड़ा दायीं तरफ क्वीन हिल थी। वो कुछ रानी के मुकुट की तरह दिख रहा था। आगे पहाड़ों के बीच में झांकता एक और पहाड़ था। जो बाकी पहाड़ों की तरह काला और हरा नहीं बल्कि सफेद था। दूध की तरह सफेद। इस पहाड़ का नाम था नंदा देवी। बादलों ने जैसे पहाड़ों को गले लगा रखा था। वाइट-ग्रे बादलों के बीच काले पहाड़ बहुत सुंदर दिख रहे थे। इन पहाड़ों के पीछे द्रोणगिरी पहाड़ था जिसे हम देख नहीं सकते थे। चालक ने हमें यह भी बताया की जोशीमठ से औली के बीच का रोप-वे एशिया का सबसे बड़ा रोप-वे है। जिसकी लम्बाई लगभग 4 कि.मी. है।

सर्दियों में यहां 6 फीट की बर्फ जम जाती है और स्की प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है। सर्दियों में यहां पर्यटकों की भीड़ लग जाती है। ट्रॉली से नीचे झांकते हुए हमें नारंगी रंग का मंदिर चमकता दिखायी दिया। पूछने पर चालक ने बताया कि वह आदिशंकराचार्य का प्राचीन मंदिर है। हरा, नारंगी, काला, ग्रे, सफेद, ढेर सारे रंग हमारे चारो ओर बिखरे हुए थे। इतनी उंचाई से वो सारे रिसॉर्ट किसी खिलौनों की तरह दिख रहे थे। हमे एक मानव निर्मित लेक भी दिखायी दी। दूर-दूर तक फैले पहाड़, बादल, हरियाली हमारे सफर के साथी बन चुके थे। मेरा डर कब सुकून में बदल गया, पता ही नहीं चला।

पोज मारना कैसे भूल सकते हैं

ट्रॉली से उतर कर बाहर निकले तो वहां एक छोटी सी कैंटीन थी। वहां पर बनने वाले पहाड़ी आलू के पकौड़ों की तारीफ चालक ने बहुत कि थी। कैंटीनवाला, खच्चरवाला और गाइड ने बाहर निकलते ही हमें घेर लिया। समय के अभाव होने के कारण हमने आगे का सफर खच्चर पर तय करने का फैसला किया। थोड़े तोल-मोल के बाद 600 रुपए में बात तय हुई। 600 रुपए लेकर भी चालक बहुत खुश था। हमें अब 3 कि.मी का सफर और तय करना था। आलू के पकौड़ों का ऑडर दे कर हम आगे बढ़ चले। खच्चर थोड़े नाखुश मालूम पड़ते थे। जो बार-बार चलने में नखरे दिखा रहे थे। सच मानिए रोप-वे से ज्यादा खच्चर पर मुझे डर लग रहा था। रास्ते में पत्थरों का बना एक छोटा सा मंदिर मिला जिसपर लाल-नारंगी झंडे लगे हुए थे। जगह-जगह पर घंटियां लटकी थी।

जब हम गंतव्य तक पहुंचे तो हमारी खुशी का ठिकाना न रहा। चारों तरफ बड़े-बड़े हरे-भरे मैदान थे। और चमचमाती धूप में हरा रंग और उभर कर दिखायी दे रहा था। ठंड़ी हवा से हमारे हाथ बर्फ हुए जाते थे। थोड़ा और करीब जाने पर हमनें एक अद्भुत नजारा देखा। वहां की चट्टानें धूप की रोशनी में चमक रही थी। जैसे हजारों हीरे उसमें गढ़े हुए हों। यह सब देख कर हमारे अंदर के बच्चे को तो बाहर आना ही था। हम जोर-जोर से सांसे ले कर उस हवा को अपने अंदर भर लेना चाहते थे। दौड़ लगाते हुए इस कोने से उस कोने तक जाते। कभी बस उस चमकीली चट्टानों पर लेट जाते और कभी धूप का आंनद लेते।

ऐसे सफर करने का अपना ही मजा है

जब जंगलों के बीच फंस गए थे हम

तभी हमें याद आया कि वापस जाने वाली चेयर कार केवल 5 बजे तक चलती है तो हमें जल्दी उतरना चाहिए। चेयर कार को हमने रोप-वे वाले रास्ते में ही देखा लिया था। तभी तय कर लिया था की इसी से नीचे उतरा जाएगा। पर चालक ने हमें पहले ही सूचित कर दिया था कि वो केवल हमें 4 किमी नीचे ही उतारेगी। बाकी का सफर हमें चलते हुए जंगल के बीच से जाना पड़ेगा। मात्र 600 रु की लागत में हवा में झूलने का मज़ा हम कैसे छोड़ सकते थे। जल्दी से कैंटीन तक पहुंचे और वहां से पकौड़ों को जल्दी से निपटाया। पर सही मायनों में वो पकौड़े अभी तक के बेस्ट पकौड़ो में से एक थे।

अपना बैग टांग कर जल्दी-जल्दी हम चेयर कार तक पहुंचे। हम उसके आखिरी सवारी थे। चेयर कार में मजा बहुत आया। हवा हमारे गालों को चूमते हुए जैसे बाय कह रही थी। ठंडी और साफ हवा। जैसे-जैसे हम नीचे जाते हमारा दिल और जोर से धड़कने लगता। उतरते ही चालक ने हमसे पूछा की आप जोशीमठ कैसे जाएंगे। तो हमने हंसते हुए जवाब दिया, पैदल। उन लोगों ने हमें आश्चर्य भरी निखाहों से देखा। हम आगे बढ़ने लगे। 5:30 ही बजे थे अब तक।

हमें 12 कि.मी. का सफर तय कर के नीचे पहुंचना था। हमने सोचा कि सेब के खेत में तेंदुए थोड़ी ना मिलेगा। और दिल्ली में तो हम 10 किमी 1 घंटे में ही तय कर लेते हैं। अभी हमें चलते हुए सिर्फ आधा घंटा ही हुआ था कि अंधेरा छाने लगा। तारे और चांद नजर आने लगे थे। हमारे मन में भय छा गया। चारों तरफ काला घना जंगल। अब तेंदुए और भालूओं की कहानी हमें सच जान पड़ती थी। काला अंधेरा और झाड़ियों से आती आवाजें। तभी एक आवाज ने हमारा ध्यान अपनी और खींचा। वह एक सब्जी ढोने वाली गाड़ी थी। हमारी तो सांस में सांस आ गयी। चालक से हमने बात की और वो हमें जोशीमठ छोड़ने के लिए राजी हो गया। गाड़ी के पीछे बैठे-बैठे हम उस रात, जंगल और रास्ते की कल्पना करते रहे। जो जंगल हमें कुछ समय पहले डरावना लग रहा था अब अच्छा लगने लगा। 7 बजे हम जोशीमठ पहुंचे। चालक का धन्यवाद देते हुए हम होटल की तरफ रवाना हो गए।

औली का सफर मेरे लिए बहुत रोमांच से भरा हुआ रहा। जैसे कहानियों में होता है। खुशी, आश्चर्य, सुंदरता, रोमांच, डर, शांति। एक ही दिन में मैने इन सभी भावनाओं का एहसास कर लिया था। औली का सफर मेरे सबसे यादगार सफरों में से एक है।


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मोनिका, अंग्रेजी की फ्रेज 'गर्ल नेक्स्ट डोर' का जीता जागता उदाहरण हैं। बिल्कुल प्यारी सी कन्या, जिससे कोई भी प्यार कर बैठे। बोलती कम हैं, सोचती ज्यादा हैं। मंहगे होटलों में रुककर छुट्टियां मनाने वाली ट्रिप से घणी नफरत करती हैं। इनके लिए घुमाई मतलब खुला आसमान हो, चमचमाती नदी हो, रास्ते में खीरा मिलता हो, कुल्हड़ वाली चाय बिकती हो और ये बस उसी में खोई रहें। मोनिका 'चलत मुसाफ़िर' में प्रोड्यूसर के पद पर तैनात हैं। ये पोस्ट तो निभाती ही हैं साथ ही हमारी टीम की रिसर्च टीम की भी हेड हैं।
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