असुर: दुनिया में सबसे पहले लोहा गलाने वाले लोग

सरहुल का उत्सव

असुर | एक काव्य-रचना पढ़ें, फिर आगे बढ़ते हैं:

पाकरी बिली तन्ना… कुड़ी लोवा बिली तन्ना… बिरिद मे तो पेरों… नावा होव झुमारी एने गावू

(भावार्थ: हे सखे ! बसंत का आगमन अब हो चुका है। पीपल व गूलर वृक्षों में फल अब सम्पूर्णता को प्राप्त करने की ओर अग्रसर हैं। आओ, हम समूह में नृत्य करते हैं।)

काव्य के नाम पर ऊपर की पंक्तियां देखे जाने पर उनमें काव्यगत सौंदर्य शायद खोजे न मिले पर इसे लिखने वाले ऐसा कोई दावा भी नहीं करते। उनके लिए यह सिर्फ उत्सव में गाया जाने वाला एक काव्य-गीत है। यह व ऐसे अनेक अन्य गीत, जिसके सर्वाधिकार सुरक्षित हैं छोटा नागपुर के पठारों में रहने वाले ‘असुर जनजाति‘ के लोगों के पास।

असुर
सरहुल का उत्सव

असुर, जिनका इतिहास सदियों पहले सभ्यताओं के विकास की शुरुआत तक जाता है। असुर, जिनका उल्लेख वेद-उपनिषद् तक में मिलता है। असुर, जिनको भारत में सिंधु सभ्यता की स्थापना करने वालों में माने जाने के पक्ष में भी मत हैं।

लौह अयस्क को गलाने की दुर्लभ तकनीक रखने वाली सदियों पुरानी असुर जनजाति, झारखंड में बसने वाली प्रथम जनजाति, जिनकी कुल जनसंख्या, 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, अब 22,459 रह गयी है।

असुर
फोटो K. K. Leuba की किताब The Asur से ली है, जिसमें एक असुर महिला लोहा बना रहीू है. यह किताब 1963 में छपी थी.

असुर: जरा सा इतिहास

असुरों के इतिहास पर जाए. तो ऋग्वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् व हिन्दू धर्म के अन्य पौराणिक ग्रन्थों में भी कुछेक जगह इस शब्द का जिक्र मिलता है। ऋग्वेद में इस शब्द का अर्थ ‘बलवान व्यक्ति’ दिया गया है, जिससे असुर लोग भी इत्तेफाक रखते हैं।

असुर
सरहुल का उत्सव

हालांकि लौह अयस्क गलाने का कार्य करने वाली इस जनजाति ने पूर्व में ऐसे क्या काम किए थे जिनसे इनका यह नाम पड़ा, इसके बारे में इन लोगों को भी अधिक नहीं मालूम। इनको इनके पूर्वजों ने बताया जिसको यह लोग आगे बढ़ा रहे हैं। यह लोग यही बताते हैं कि इनके पूर्वजों ने कुछ ऐसे कार्य अवश्य ही किए रहे होंगे जिससे उनका यह नाम पड़ा।

किन्तु क्या वर्तमान समय के असुर उन वैदिक कालीन असुरों व उन वैदिक कालीन असुरों के मध्य कोई सम्बन्ध हैं ?

रांची व आसपास के इलाकों में जो आर्कियोलॉजिकल खोजें हुई हैं, वह ऐसी खोजें नहीं हैं जिनको इस विवाद में निर्णायक माना जा सके किन्तु फिर भी असुर जनजाति के लोग स्वयं को वैदिक कालीन असुरों के वंशज ही मानते हैं।

असुर जनजाति के घर

असुरों को अपने क्षेत्र में सबसे पिछड़ी जनजाति माना जाता है किन्तु कम से कम इनके घर ऐसा नहीं दर्शाते। सामान्य रूप से इनके घरों में 3 हिस्से होते हैं। एक हिस्सा रसोई, एक हिस्सा सोने के लिए व एक हिस्सा पालतू जानवरों के लिए होता है। कुछ अधिक गरीब घरों में रसोई व सोने का कमरा एक साथ ही होता है।

घरों पर चित्रकारी के माध्यम से सरकार के प्रति विरोध दिखाता असुर समाज

घर सामान्यतः झोपड़ीनुमा होते हैं जिनकी दीवारें मिट्टी की व छत खपरैलों के बने होते हैं। असुर पूर्व में एक कुशल निर्माता रहे हैं जो कि इनके निवास निर्माण में परिलक्षित होता है। जो असुर गरीब नहीं हैं उनके घरों में पीतल के बर्तन मिल जाते हैं। वहीं अन्य लोग कुम्हार द्वारा बनाए गए मिट्टी के बर्तन अधिकता में उपयोग करते हैं।

असुर जनजाति की वेशभूषा

असुरों की वेशभूषा किसी गाँव के किसी भी सामान्य व्यक्ति सी है। पुरुष सामान्य तौर पर शरीर के निचले हिस्से के लिए ‘धोती’ अथवा ‘लुंगी’ का उपयोग करते हैं। ऊपरी हिस्से के लिए शर्ट या टी-शर्ट चलन में हैं। युवा असुरों के सिर खुले होते हैं। कुछ उम्रदराज लोग सिर को गमछे से बांंधते हैं। स्त्रियां साड़ियां पहनती नज़र आती हैं। जूते का प्रयोग अक्सर ही होता है।

सरहुल उत्सव मनाते असुर

खुद को तमाम तरह के आभूषणों से अलंकृत करने का शौक असुर रखते रहे हैं। पुरुष कमर पर एक धागे को लपेट कर रखते हैं जिसे ‘करधनी’ कहते हैं। स्त्रियां भी कानों व गले के लिए तमाम आभूषण उपयोग करती रही हैं जो कि चांदी, पीतल आदि से बने होते हैं।

असुर जनजाति का खान-पान

असुरों का मूल भोजन सामान्य जन जैसा ही है। चावल, सब्जियां, मांस, कद्दू, बैंगन, प्याज़ व मशरूम व अनेक फल इनके भोजन में शामिल होते हैं। कई पेड़-पौधों जैसे, कोयनार, फुटकल, कचनार आदि व महुआ भी लगभग इनके प्रत्येक भोजन में अपनी उपस्थिति रखते हैं।

असुर, गायों को नहीं दूहते व उनका दूध उनके बछड़ों के लिए छोड़ दिया जाता है। हालांकि वे भैंस दुहते हैं व उनके दूध से दही बना कर खाद्य सामग्री के तौर पर उपयोग करते हैं। चावल से बनी बीयर (राइस बीयर) व महुआ की शराब असुरों के खान-पान में विशेष स्थान रखते हैं।असुर

असुर जनजाति की कला, व्यवसाय व अर्थव्यवस्था

असुर प्राचीन काल से ही लौह अयस्क गलाने की अपनी कला के कारण प्रसिद्ध थे। ये जंगल की लकड़ियों से चारकोल बना कर पत्थर, जिनमें लौह अयस्क की मौजूदगी होती थी, उनको गला कर उससे धातु निकालते थे। इसके लिए जंगलों से उन्हें पर्याप्त मात्रा में लकड़ियां मिल जाती थी।

किन्तु धीरे-धीरे जब सरकारों ने जंगल अपने कब्जे में लेकर वहां तमाम उत्खनन कार्य शुरू कर दिए तो इनके हाथ से चारकोल बनाने के किये जरूरी लकड़ियां जाती रहीं व इनकी अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई।असुर

वर्तमान में हालांकि यह धीरे-धीरे कृषि को अपना रहे हैं। उनको समझ आने लगा है कि यह रास्ता ही अब उनको धीरे-धीरे कुछ धन के साथ मुख्यधारा में लाने की तरफ कुछ मददगार होगा। असुर अब सरकारों की तमाम कोशिशों के बाद आलू की खेती करने लगे हैं।

पठार के बंजर, ऊसर जमीन पर आलू की कल्पना करना ही आश्चर्य की बात थी किन्तु यह मुमकिन हो सका। अब असुरों के अनेक समूह आलू की खेती करने लगे हैं। 1997 में नेतरहाट पठार में आलू की खेती के कार्यक्रम की शुरुआत के बाद से इसकी पैदावार में वृद्धि ही हुई है।

मृतक असुर को दफनाने, मसना (श्मसान) ले जाते लोग

यह पठार पहले रांची जिले में ही आता था किन्तु 1983 में गुमला क्षेत्र को अलग जिला बना दिया गया ताकि प्रशासनिक रूप से योजनाएं तैयार करने में कुछ आसानी हो जिसका कुछ फायदा होता तो दिखता है।

इससे इनकी अर्थव्यवस्था बदली है व बेहतर होना शुरू हुई है। असुर प्रगतिशील होने लगे हैं। बच्चे विद्यालय में जा रहे हैं। उम्मीद है समाज की मुख्यधारा में जल्द ही इनका प्रवेश होगा।

मृतक असुर कब्र में भी प्रकृति के साथ रहते हैं. जंगल यानी प्रकृति के साथ आदिवासियों का अभिन्न रिश्ता है. ये सखुआ के पत्ते हैं.

असुरों का वर्तमान

वर्तमान में असुर स्वयं के अस्तित्व को बचाने की छोटी-छोटी लड़ाइयां लड़ रहे हैं। धीरे-धीरे मुख्यधारा में आ रहे हैं। सुषमा असुर असुर जनजाति की पहली कवियित्री हुई हैं। सुषमा झारखंड से बाहर आकर तमाम कार्यक्रमों में शिरकत कर रही हैं व अपनी संस्कृति से लोगों को परिचित करा रही हैं। अश्विनी कुमार पंकज, असुर व अन्य जनजाति व आदिवासी समाज के लिए कार्य कर रहे प्रमुख लोगों में से हैं।असुर

भारत में जहांं धूमधाम से दुर्गा पूजा व नवरात्रि के पर्व मनाए जाते हैं, उसी भारत के एक हिस्से में असुर जनजाति महिषासुर व रावण को अपना पूर्वज मानते हैं। सुषमा असुर ने वीडियो जारी कर व तमाम मंचों से कहा है कि नवरात्र के पर्व को मनाना बन्द करना चाहिए।

असुर
समुदाय की मुखर आवाज, सुषमा असुर

किसी की हत्या को इस तरह महिमामण्डित करना व उत्सव मनाना किसी सभ्य समाज में अपेक्षित नहीं होना चाहिए। अश्विनी कुमार पंकज कहते हैं कि महिषासुर को खलनायक बताने वाले लोगों को उनके नायकत्व की भी पढ़ाई करनी चाहिए। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में 25 अक्टूबर, 2011 को पहली बार महिषासुर शहादत दिवस भी मनाया गया था।

असुर लोग नवरात्र में शोक मनाते हैं। असुर बच्चे मिट्टी से बने खिलौनों से खेलते वकेत शेर की गर्दन तोड़ कर खेलते हैं। वह शेर को दुर्गा की सवारी के तौर पर देखते हैं व दुर्गा असुर समाज में खलनायिका के पद पर विराजमान हैं।

असुरों को मुख्यधारा में लाने की एक और कोशिश में 2014 में पहली बार गुमला जिले के विमलचन्द्र असुर ने झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) के टिकट पर बिशुनपुर लोकसभा सीट से चुनाव भी लड़ा। 2020 में 19 जनवरी से तमाम प्रयासों से असुर मोबाइल रेडियो की भी शुरुआत की गयी।

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असुर रेडियो का संचालन करतीं सुषमा असुर | बिजली के लिए सौर ऊर्जा उपकरण का प्रयोग किया जाता है

भारत तमाम तरह की संस्कृतियों, सभ्यताओं की भूमि है। जहां एक तरफ दुर्गापूजा होती है, वहीं दूसरी तरफ महिषासुर को नायक व भगवान तथा दुर्गा को खलनायिका मानने वाली संस्कृतियां यहीं इसी भूमि पर मौजूद हैं। जनजातियों की हालत, भाषा, संस्कृति, लगभग सब कुछ ही खतरे में है।

असुरों की खुद की भाषा खतरे में है। नए लोग अधिकतर हिंदी ही बोलने लगे हैं। उनके जंगल छीने जा रहे व आंदोलन करने पर भी उनकी कोई सुनने वाला नहीं है। कोई भी वर्ग उनकी आवाज उठाने वाला नहीं, उल्टे उनके व सत्ता के बीच टकराव में उनको ही हेय दृष्टि से देखा जाता है।

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रमेश असुर. असुर अखड़ा रेडियो के जॉकी।

हो सकता है असुर तथाकथित नगरी सभ्यता को सीख कर सभ्य हो जाएं व मुख्यधारा में आ जाएं किन्तु क्या इसके लिए वह अपनी संस्कृति का बलिदान करने को तैयार हैं, या फिर क्या अपनी संस्कृति को बरकरार रखते हुए वह अपनी मुख्यधारा में आ सकेंगे?

यह एक अहम सवाल है जो उनके अस्तित्व को निर्धारित करेगा। हम शहरी लोगों के लिए कहते हैं कि पाश्चात्यकरण की दौड़ में हम अपनी संस्कृति खोते जा रहे किंतु इसी भारत में वर्तमान शहरी भारतीय संस्कृति के कारण भी लोग अपनी संस्कृति खतरे में महसूस कर रहे हैं।

असुर
नेतरहाट के जंगल रिकॉर्डिंग स्टूडियो में आप सभी का स्वागत है. हम हैं सुषमा असुर और आप सुन रहे हैं असुर अखड़ा रेडियो

जैसा कि अश्विनी कुमार पंकज आदिवासियों व जनजातियों को लेकर अपने एक सम्बोधन में कहते दिखते हैं, “हमें (आदिवासियों/जनजातियों) को प्रेमचन्द क्यों बनना है?”

हम (आदिवासी/जनजाति साहित्यकार) उनकी कहानियां क्यों लिख रहे हैं जो हमारी दुनिया नहीं है। हम कहते हैं कि कोई हमको दिखाता नहीं, जगह नहीं देता, किन्तु आदिवासी लेखक खुद अपने समाज को कितनी जगह दे रहे हैं? हम उनकी नकल करने की कोशिश कर रहे हैं जो दुनिया हमारी है ही नहीं।”

कमोबेश यही बात संस्कृति के लिए भी कही जा सकती है। या क्या हम मान लें कि समाजिक गतिशीलता में ऊपर की ओर चढ़ने पर स्व-संस्कृति का क्षय ही ग्लोबल-विलेज की अवधारणा का सत्य है? असुरों को, उनके समाजसेवकों को इस बारे में ध्यान देना चाहिए वरना सरकारें तो इन पर रहम नहीं करेंगी।

जरूरी सूचना:

ये सारी तस्वीरें ASUR Adivasi Wisdom Documentation Initiative फेसबुक पेज से ली गई हैं.


ये लेख है ‘चलत मुसाफ़िर’ में इंटर्नशिप कर रहे शिवम श्रीवास्तव की तरफ से। शिवम पत्रकारिता के छात्र हैं। उन्हें तस्वीरें उतारना पसंद है। घूमना पसंद है। घूमने से मिलने वाले किस्सों को कला की किसी फॉर्म में कहने का भी सपना है। शिवम आगे बताते हैं कि ‘पैरासाइट’ फ़िल्म का संवाद है,‘With no planning, nothing can go wrong.’। मेरी भी कुछ योजना नहीं है कि क्या कैसे करना है। बस उम्मीद भर है कि मध्यमवर्गीय परिवारों के आर्थिक असुरक्षा के भाव से निकल कर इन सब सपनों में से ही कहीं कुछ अच्छा कर लेंगे।


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