जयपुर में जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं खूबसूरती और परंपरा का संगम गहराता जाता है

कुछ दिनों पहले मैं और मेरा मित्र शशांक राजस्थान के कुछ शहरों के भ्रमण पर निकले थे। वो शहर थे जयपुर, अजमेर और पुष्कर। कॉलेज की व्यस्त दिनचर्या में सिर्फ सप्ताह के अंत में ही फुरसत मिल पाती है। तो कुछ दिन से जेहन में था कि क्यों न इस हफ्ते कहीं घूम आएं? चर्चा के बाद लगभग 5-6 लोगों का समूह बन गया। लेकिन जैसा कि हर बार होता है आखिर समय आते-आते या तो आपका जाना ही न हो पाएगा आप अकेले पड़ जायेंगे। जिस दिन शाम को हमें निकलना था उस दिन मैं और शशांक ही जाने को तैयार थे। यात्रा शुरू हुई भारतीय रेलवे की सहायता से। दिल्ली से जयपुर पहुंचे और जयपुर यात्रा प्रारंभ।

जैसे ही हम जयपुर रेलवे स्टेशन से बाहर निकले तो एक स्टाॅल पर पोहा दिखाई दिया। हम जन्मे मध्यप्रदेश में हैं तो पोहा से अलग ही लगाव है। तो क्या था उस ओर खिंचे चले गए। पोहा उतना बढ़िया तो नहीं था मगर यह जरूर बता रहा था कि अब खान-पान किसी सीमा का मोहताज नहीं रहा। आपको दक्षिण भारत के इडली-डोसा उत्तर भारत में मिल जाएगा। वैसे ही मध्य प्रदेश का पोहा यहां जयपुर में मिल रहा था।

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नाश्ते के बाद सवाल था कि जयपुर घूमा कैसे जाए? तो ऑटो रिक्शा वालों से तफ्तीश शुरू कर दी। एक जनाब से बात जमी तो उसी में बैठ गए। ऑटो वाला जो कुछ अंग्रेजी जानता था उससे अपने आप को अलग दिखाने की कोशिश कर रहा था। उसका ‘हैलो माह डियर फ्रेंड, लेट्स डिस्कवर पिंक सिटी’ बोलना हम पर प्रभाव डाल रहा था। सबसे पहले वो एक अपनी पसंद की चाय की दुकान पर ले गया। घूमने से पहले इतनी सही चाय मिली कि सारे दिन के लिए ऊर्जा मिल गई।

आमेर किला

सबसे पहले पहुंचे आमेर किला। वह किला जो आज भी बड़े ठाठ से राजस्थान के राजपूताना अंदाज को बयां कर रहा था। मानों अपनी मूंछे ऐंठते हुए हमारा स्वागत कर रहा है। हमारे ऑटो चालक ने बताया कि वीर फिल्म के कुछ दृश्य यहीं फिल्माए गए थे। यह सुन कर किले को देखने की उत्सुकता और बढ़ गई। फिर क्या था थोड़ी देर बाद हम किले के अंदर थे। किले का एक-एक पत्थर राजपूतों की गौरव गाथा सुना रहा था।

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अमूमन राजस्थान का नाम सुनकर मन में एक ऐसी जगह का दृश्य बनता है। जहां बहुत गर्मी है और बड़ा-सा रेगिस्तान है। लेकिन आमेर के किले से सामने पर्वत श्रखंला देख कर दिल को अलग सुकून मिलता है। अंदर विदेशी सैलानियों का जमावड़ा भी मिला जो कुछ देर पहले हाथियों पर सवार होकर किले तक पहुंचे थे।

जलमहल

जलमहल का नाम सुना था और कुछ तस्वीरें भी देखीं थीं। इसे लेकर भी काफी उत्सुकता थी तो आमेर के बाद पहुंच गए जलमहल। वास्तु कला का इतना बेहतरीन नमूना आंखों के सामने था कि आंखें हटाने का मन ही नहीं हो रहा था। अब तक कहानियों किताबों में ही सुना था कि कोई महल है जो जल से घिरा हुआ है लेकिन अब वो सामने था। मध्यकालीन महलों में बना यह महल जयसिंह द्वारा निर्मित है। इस महल को ‘रोमांटिक महल’ के नाम से भी जाना जाता है।

भारत में कई जगहों की तरह जयपुर में भी बिड़ला मंदिर स्थित है। इस मंदिर को लक्ष्मीनारायण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर जयपुर के पर्यटन आकर्षणों में से एक है। वैसे तो जयपुर में मंदिर बहुत है लेकिन इस मंदिर में बात कुछ अलग ही है। जयपुर को छोटी काशी के नाम से भी जाना जाता है। वजह है यहां के लोगो की आस्था। इतिहास की कुछ बातों में पता चलता है कि राजस्थान के राजा महाराजाओं में पूजा-पाठ की प्रवृत्ति बहुत ही ज्यादा थी।

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( ये इस यात्रा का पहला भाग है, आगे का ब्यौरा यहां पढ़ें)


ये रोचक यात्रा वृतांत हमें लिख भेजा है राघवेंद्र उपाध्याय ने। राघवेंद्र पत्रकारिता के छात्र हूैं। अपने बारे में जब चार लाइन में लिख भेजने को हमने उन्हें बोला, तो वो बोले, घूमने फिरने का शौकीन हूं, तो जब भी वक्त मिलता है निकल पड़ता हूं। दृश्यों को आंखों से नहीं अंतर्मन से भी देखने की कोशिश करता हूं, कैमरे से परहेज़ है, आंखों में कैद करने में यकीन रखता हूं।


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