अलवर: Rolls Royce कारों को कचरागाड़ी बनाने वाले राजा की जनमानस में कहानी

आग्रह: ये यात्रा संस्मरण पूरा पढ़ें। ब्लॉग के अंत में चलत मुसाफ़िर की संपादिका की तरफ से आवश्यक सूचना है, वो छूॉने न पाए। अन्यथा इस ब्लॉग तक पहुंचना व्यर्थ जाएगा.  


आपने भारत के उस राजा की कहानी तो जरूर सुनी होगी जिनके जीवन की बस एक घटना ने उन्हें पूरी दुनिया में प्रसिद्ध कर दिया था। अमूमन शाही खानदान से ताल्लुक रखने वाले लोगों की शान-ओ-शौकत तो जुदा होती ही थी लेकिन जब बात राजा की हो रही हो तो उनके शौक विरले होते थे। ये कहानी भी ऐसी ही है।

जय विलास महल

लन्दन की सड़कों पर घूमते हुए भारत के राजा को ‘Rolls Royce’ कार का शोरूम दिखता है। गाड़ियों के बहुत शौकीन राजा शोरूम के अंदर जाते हैं और उन्हें एक कार बहुत पसंद आती है। वे एक कर्मचारी को बुलाकर कार के विषय में पूछताछ करने लगते हैं। लेकिन शोरूम का कर्मचारी उन्हें साधारण वेशभूषा में देख, लिबास से उनकी औकात का अंदाजा लगाकर, बिना कोई जानकारी दिए बेइज्जत करके शोरूम से बाहर निकाल देता है।

राजा गुस्से में होटल लौटते हैं और Rolls Royce कंपनी को फोन कराते हैं कि वे कार देखने आ रहे हैं। अपनी शाही पोशाक में पहुंचे राजा के स्वागत में रेड कार्पेट बिछा होता है। राजा शोरूम में खड़ी छः कारें खरीदते हैं और उसी समय नगद रुपया भुगतान करते हुए सारी कारें भारत भेज देते हैं।

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Rolls Royce कम्पनी एक साथ इतनी गाड़ियां बिकने की खुशियां मना रही होती है लेकिन भारत आयी कारों का प्रयोग राजा अपने लिए नहीं करते बल्कि कारें नगरपालिका को दे दी जाती हैं और नगरपालिका गाड़ियों का प्रयोग कचरा उठाने वाली गाड़ी के रूप में करने लगती है।

बाएं: महाराजा जय सिंह प्रभाकर, दाएं: मंहगी कार बनी कचरा-गाड़ी

उस समय Rolls Royce कार रईसी का प्रतीक मानी जाती थी। बहुत अमीर लोगों के पास ही इस कंपनी की कारें हुआ करती थीं। दुनिया के लोगों को जब पता चलता है कि जिस कार में बैठ कर वो खुद को रईस समझ रहे हैं, भारत में एक राजा उसी गाड़ी का प्रयोग कचरागाड़ी के रूप में करता है तो लोग कंपनी की कारें खरीदना बंद कर देते हैं। कार की खरीद में भयंकर गिरावट आने लगती है। अंत मे Rolls Royce कम्पनी हार मान कर राजा को पत्र लिखकर माफी मांगती है और अनुरोध करती है कि उनकी गाड़ियों का प्रयोग कचरागाड़ी के रूप में न किया जाए। साथ ही कम्पनी 6 कारें उन्हें उपहार में देती है।

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ये कहानी अलवर के महाराज जय सिंह प्रभाकर की है और यह घटना है 1920 की। उनका महल ‘जय विलास’ अब खंडहर में बदल चुका है। जहां यह महल है वो एरिया सरिस्का टाइगर रिजर्व में आता है।

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संपादकीय स्पष्टीकरण:

दोस्तों,
अभी आपने चलत मुसाफ़िर की स्टोरी में अलवर के महाराजा जयसिंह के महल और उनसे जुड़ी एक बहुत ही रोचक और प्रचलित कहानी के बारे में पढ़ा।

हमारे सुधी पाठक शिवम भट्ट ने इसके पब्लिश होते ही हमें टोका कि ये एक गलत कहानी हो सकती है। हमने उनके साथ फैक्ट चेक किया तो पाया कि जिस झाड़ू लगी कार को महाराजा जय सिंह की संपत्ति बताया जाता है, वो कहीं से भी Rolls Royce के बीसवीं सदी के किसी भी मॉडल से मिलती-जुलती नहीं है।

बल्कि ये Ford Phaeton 1934 से मेल खाती दिख रही है।

जब हमने इस कहानी के बारे में न्यूज वेबसाइट्स खंगाली तो पाया कि उन सबने वही स्टोरी छापी है, जो हमारी गेस्ट ट्रैवल ब्लॉगर श्रेया उत्तम ने अपनी अलवर यात्रा के दौरान स्थानीय लोगों से सुना और लिखकर हमें भेजा।

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अब ऐसी स्थिति में दो चीजें सम्भव हैं।
1. लोकमानस में मौजूद इस कहानी में Rolls Royce की जगह Ford कार हो। बीसवीं सदी में जाहिरन तौर पर भारत में लोगों को कारों के ब्रांड के बारे मे इतनी मालूमात नहीं होती होगी।

या फिर

2. ये द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान किसी और देश की कार हो। और ये झाड़ू सम्भवतः सड़कों पर पड़े कांच और अन्य नुकीली चीजों से बचने के लिए लगाए गए हों। (लेकिन इस अनुमान के समर्थन में हमें कोई पुख्ता न्यूज स्टोरी नहीं मिली.)

इसलिए, अब हम श्रेया के मूल ब्लॉग में इस प्रचलित कहानी के साथ ये बातें भी जोड़ रहे हैं।

पढ़ते रहिये, घूमते रहिए, गुनते रहिये।

शुक्रिया 💙


ये दिलचस्प बातें हमें लिख भेजी हैं श्रेया उत्तम ने। श्रेया ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता से ग्रेजुएशन किया है और यूनिवर्सिटी की गोल्ड मेडलिस्ट हैं। श्रेया अभी डीयू से हिंदी लिटरेचर से मास्टर्स कर रही हैं। इन्हें लिखना, पढ़ना, फोटोग्राफी और नई जगहों में घूमना बहुत पसन्द है।


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