अफगान कॉलोनी, दिल्ली: एक शरणार्थी बसाहट और दो संस्कृतियों का सुंदर संगम

अफगान कॉलोनी, दिल्ली | देश की राजधानी दिल्ली की लाजपत नगर की कुछ गलियां अफगान कॉलोनी के नाम से जानी जाती हैं। इन गलियों से गुजरते वक्त आपको अफगानी खान-पान, रहन-सहन और पहनावे की झलक देखने को मिल जाएगी।

दरअसल ये कॉलोनी रिफ्यूजी लोगों के लिए बनाई गई थी। जहां अफगानिस्तानी रिफ्यूजी, तालिबान शासन से बचने के लिए यह आकर रहने लगे। इनकी संस्कृति ,खान-पान और जीवनयापन के बारे में कुछ बातें यहां बताई जा रही हैं।


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एशिया का दिलः अफगानिस्तान

अफगानिस्तान रेशम मार्ग और प्रवास का एक प्राचीन बिंदु रहा है। सन 1996 से अफगानिस्तान तालिबान के प्रभुत्व में आ गया है। 2001 में अफगानिस्तान युद्ध के बाद तालिबान विलुप्त तो हुआ लेकिन 2004 में फिर से इसकी जड़े विकसित होने लगीं। तालिबानी हमलों से बचने के लिए मजबूरन यहां के लोगों को प्रवासी बनना पड़ा।

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दिल्ली की लाजपत नगर की गलियों में अंग्रेजी और पश्तों में लिखे बोर्ड बताते हैं कि दिल्ली के इस कोने का रिश्ता सीधे काबुल से जुड़ा है। अफगानी पकवान की खुशबू, पश्तो, दारी जबान की मिठास और अफगानी लोगों के सजने-संवरने का अंदाज ही इन गलियों को अफगान कॉलोनी बना देता है। स्वाद और भाषा से लोगों का दिल जीतकर दो संस्कृतियों को एक सांचे में ढालकर आज भी ये लोग अपनी संस्कृति को बचाए हुए हैं।

अफगान कॉलोनी, दिल्ली में पकवान

अलग-अलग प्रकार की ब्रेड, लोफ, अफगानी बोरबा-कबाब (तंदूरी मटन), काबुली पूजबे की रोटियां और परांठे जैसे कई लजीज पकवान यहां लोगों को काफी पसन्द आते हैं। यहां कई सारे रेस्त्रां हैं जो अफगानी खाना परोसते हैं।

शरणार्थियों की मुश्किलें

किसी भी प्रवासी को रोजगार मिलना आसान नहीं होता है इसलिए इन लोगों ने अपनी संस्कृति और खान-पान को अपना व्यवसाय बनाना लाजिमी समझा। इन्होंने अफगानी पकवान व पोशाक की दुकानें खोल लीं। इन सबके बावजूद आज भी इन लोगों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता हैं।

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पहला तो यह कि ये मुल्क उनका नहीं है, इसलिए उन्हें पराये की निगाहों से देखा जाता हैं। किरायेदार इन लोगों से दोगुना किराया मांगते हैं। अफगान लोगों के पास रोजगार के नाम पर कोई नौकरी नहीं है। वे तो बस अपने अफगानी पकवानों और सामानों को बेचकर गुजारा चला रहे हैं।

आपको अगर दिल्ली में अफगान देश की झलक और पकवानों का स्वाद लेना है तो लाजपत नगर की अफगान काॅलोनी अपनी बाहें फैलाए स्वागत कर रही है। अफगान काॅलोनी में आप किसी भी दिन आ सकते हैं। अफगान कालोनी का बाजार सुबह 9 बजे से रात 10 बजे तक धड़ाधड़ चलता ही रहता है।


अफगान कॉलोनी, दिल्लीअफगान काॅलोनी के बारे में ये जानकारी हमें लिख भेजी है सत्यम यादव ने। सत्यम खुद अपने बारे में बताते हुए कहते हैं, ज्यादा सोचता नहीं मैं, बस जो मन मैं आता है वो करता हूं। घूमना पसन्द है और फोटोग्राफी भी। बाकी खुद की और मंजिल की तलाश में हूं। और हां, नए फैशन को फॉलो करना भी इनका एक जुनून है। सत्यम ने इतिहास विषय में अपना पोस्टग्रैजुएशन किया है। 


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